साधनासदन आश्रमका उद्देश्‍य

मानवजीवनकी सफलताके लिए यम, नियमादि, योग, सगुणोपासना एवं शम, दम तथा श्रवण, मनन आदि ज्ञानके साधनों द्वारा अद्वैत परमात्माका साक्षात्कार ही साधनासदनका मुख्य उद्देश्‍य है।

निवासी :-

सदाचारी अद्वैतपरमात्मपरायण, सदनके अंगस्वरूप, निष्ठावान्, विद्वान्, तत्वदर्शी, दश्‍नामपरमहंससंन्यासी एवं उनके नैष्ठिक ब्रह्मचारी, साधनाव्रती, एकान्त एवं शान्तिप्रिय सन्तही व्यवस्थापककी अनुमति से आश्रमके नियमों का पालन करते हुए पारस्परिकसदभावपूर्वक यथेष्ट निवास कर सकते हैं। शुक्लवस्त्रधारीका निवास निशिद्ध है।

नियम :-

1) सदन की विशेष सेवामें संलग्न व्यक्तिको छोडकर साधना सदन में निवास करनेवाले सन्तों एवं ब्रह्मचारीयोंको गंगा स्नानादि करके अर्चावतार भगवद्विग्रहोंका दश्‍ार्न-पूजन, प्रात: सायं की आरती, शान्तिपाठ, विष्णुसहस्रनाम पाठ, महिम्न पाठ एवं भोजनके समय सामुहिक गीतापाठ, स्वाध्याय-सत्संगमें नियमपूर्वक भाग लेना आवश्‍यक है।
2) जो आश्रमके नियमोंका भलीभांती पालन नहीं कर सकते वे अधिक से अधिक तीन दिन तक निवास कर सकेंगे।
3) बहिमुर्खी निशिद्ध आचरण करनेवाले, मनमाना बाजार आदि में घुमने वाले एवं याचक यहाँ न रह सकेंगे।
4) आश्रमके गृहस्थ भक्तों से स्वतंत्र किसी प्रकार का सम्बन्ध करना सर्वथा निशिद्ध है।
5) प्रत्येक व्यक्ति सदनकी स्वच्छता, शान्ति एवं पवित्रता का पूर्ण ध्यान रखें।
6) साधु वेश में भी किसी स्त्री जाति एवं अल्पवयस्कका निवास निशिद्ध है।
7) सदनके संचालक एवं व्यवस्थापक उक्त सन्त महात्माही होंगे।
ईशप्रेरणयाSनेन
यतिना त्यागमूर्तिना।
परात्मबोधाभीप्सूनां
साधकानां हितेच्छया।।
देवसदन.संयुक्तं
साधनासदनाश्रमम्।
स्थापितं चंद्रनेत्रख-
नेत्राब्दे वैक्रमाभिधे।।
परिचय:
मुमुक्षवो ब्रह्मनिष्ठा:
न्यासिन:शुद्धमानसा:।
वर्णिनश्चानुगास्तेषां
निवसन्त्वत्र निर्भया:।।
स्वगृहश्रंखलामुक्ता:
परमात्मपरायणा:।
हितैषिणश्च संस्थाया:
तेsत्र वासेsधिकारिण:।।
संस्थापकस्योद्वार:।।